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-महंत अवैद्यनाथ के इशारे पर हुई थी बाबरी विध्वंस की शुरुआत
अयोध्या, 08 जनवरी (हि.स.)। राम मंदिर आन्दोलन के दौरान राम भक्तों के जुनून को भुलाया नहीं जा सकता। उस समय समाज में भी गजब की चेतना थी। राम जन्मभूमि के सभी आन्दोलनों व कार्यक्रमों में सहभागी रहे भाई लाल यादव ने बताया कि 1992 की कारसेवा में लाखों रामभक्त अयोध्या पहुंचे थे।
पूरी अयोध्या जन्मभूमि है राम लला की, बाबर की जागीर नहीं। जिस हिन्दू का खून न खौला खून नहीं वह पानी है, जन्मभूमि के काम न आये वह बेकार जवानी है… जैसे नारों से राम नगरी गूंज रही थी। जन्मभूमि परिसर में बने विशाल मंच पर भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, श्रीराम जन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष व दिगम्बर अखाड़ा के महंत रामचन्द्र दास परमहंस, अशोक सिंहल, कलराज मिश्र, साध्वी ऋतम्बरा, साध्वी उमा भारती, विनय कटियार व अनेक संत मौजूद थे।
मंच से विश्व हिन्दू परिषद व भाजपा के नेता लगातार यह घोषणा कर रहे थे कि हम सब लोग यहां से एक-एक मुट्ठी बालू ले जाकर सरयू में डालेंगे और प्रतीकात्मक कारसेवा करेंगे। कारसेवक यह बात सुनकर लगातार आक्रोशित हो रहे थे। यह लोग राजनीति करते हैं। हर बार हम लोगों को बुलाकर बेवकूफ बनाते हैं। आचार्य धर्मेन्द्र ने अत्यंत जोशीला भाषण देकर कारसेवकों का उत्साह बढ़ाया। अंतिम उद्बोधन महंत अवैद्यनाथ का हुआ। महंत अवैद्यनाथ ने कहा कि आप लोग सक्षम हैं और समझदार हैं। इतना कहते ही कारसेवकों ने धावा बोल दिया और ढ़ांचे का नामोनिशान मिटा दिया।
भाईलाल यादव ने बताया कि कारेसवा की शुरुआत में सुरक्षाकर्मियों ने दो हवाई फायर किया। विनय कटियार मंच के बगल एक टीले पर खड़े थे। तुरंत उन्होंने माइक थाम कर कहा कि खबरदार, जितने भी सुरक्षाकर्मी हैं अपने स्थान से 10 कदम पीछे हट जाएं। कुछ लोग ढ़ांचे पर चढ़ गए। कुछ नीचे तोड़ने लगे। कुछ लोग गुम्बद के नीचे घुस गए। कुछ राम भक्त चोटिल भी हुए। राजमाता विजयाराजे सिंधिया बार-बार मंच से आग्रह कर रहीं थीं कि हे मेरे जिगर के टुकड़ों, बाहर आ जाओ कारसेवा करने दो।
उन्होंने बताया कि बगल की दीवार तो जल्दी गिर गयी लेकिन गुम्बद बहुत मजबूत था। उसमें गैंती से छेदकर रस्सा बांधकर कारसेवकों ने खींचा तब जाकर गिरा। इस दौरान कुछ लोग मलबे में नीचे दब गये। तब संघ के कार्यकर्ताओं ने जन्मभूमि से श्रीराम अस्पताल तक एक दूसरे का हाथ पकड़कर गलियारा बनाया। उस गलियारे से घायल कारसेवकों को श्रीराम अस्पताल पहुंचाया गया। बड़ी संख्या में कारसेवक घायल हो गए। मंच से घोषणा की गयी कि यहां पर जितने भी डाक्टर हैं वह चाहे सरकारी हों या प्राईवेट, तुरंत श्रीराम अस्पताल पहुंचकर घायल कारसेवकों की मरहम पट्टी करें।
कम्युनिस्ट नेता मित्रसेन यादव ने रास्ते में डलवायी थी लोहे की कीलें
भाईलाल यादव ने बताया कि 1992 की कारसेवा में बड़ी संख्या में रामभक्त साइकिल से अयोध्या जा रहे थे। उस समय पूर्व सांसद मित्रसेन यादव ने मिल्कीपुर के रास्ते में लोहे की कील डलवा दी थी। ताकि लोगों की साइकिल पंक्चर हो जाए। उस समय सैदपुर के आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में लोग साइकिल से अयोध्या के लिए निकले। सैदपुर के सदगुरु वैश्य व मल्लहन पुरवा के मुट्टुर मल्लाह पंक्चर बनाने का सामान और पम्प साथ में लेकर अयोध्या के लिए निकले। सदगुरु ने बताया कि जहां पर तालाब मिलता था वहीं पर रुककर हम दोनों लोग साइकिल का पंक्चर बनाते थे।
नाविक ने कारसेवकों से नहीं ली उतराई
1990 के दौरान भाई लाल यादव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के रुदौली के तहसील कार्यवाह थे। तत्कालीन मुलायम सिंह यादव की सरकार ने अयोध्या जाने पर पाबंदी लगा दी थी। संघ के कार्यकर्ताओं को पुलिस पकड़कर जेल में डाल रही थी। उन्होंने बताया कि उनके क्षेत्र में जितने संघ के कार्यकर्ता थे, भूमिगत थे। पुलिस किसी संघ कार्यकर्ता को नहीं पकड़ पायी। इसलिए पुलिस ने खानापूर्ति के लिए क्षेत्र के सपा व कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को उठा ले गयी। महंत रामप्रीति दास समाजवादी पार्टी से जुड़े थे। उनको भी पुलिस ने जेल में डाल दिया था। 1990 की कारसेवा में प्रतिबंध होने से लोग छिपकर अयोध्या जा रहे थे। लखनऊ से अयोध्या की तरफ रेलगाड़ी रोक दी गयी थी। रास्ते में पुलिस की बैरीकेटिंग थी। वह बताते हैं कि दिल्ली के नगर कार्यवाह 40 कारसेवकों का एक दल लेकर अमेठी जिले गोमती नदी पार कर गणेशपुर के बगल जंगल से होते हुए रामपुर गुदारा पहुंचे। सबसे दिलचस्प बात यह रही कि बखरा घाट के नाविकों ने रामभक्तों से उतराई नहीं ली। वहां पर उनको खेत में ही जलपान कराया। इसके बाद हरिहरपुर के गंगा प्रसाद यादव, रामपुर से जगन्नाथ यादव, रामदेव नाई व फक्कड़ बढ़ई समेत करीब दो दर्जन लोगों के साथ अयोध्या के लिए निकल गये। उस समय रामपुर में संघ की शाखा लगती थी। इसलिय सब स्वयं से तैयार हो गये। भाईलाल ने बताया कि खेत खलिहान के रास्ते हम लोग फैजाबाद के निकट मानापुर गांव पहुंचे। मानापुर में हजारों लोग वहां गांव वाले भोजन करा रहे थे। सब लोग भोजन के बाद अयोध्या पहुंचे। अयोध्या में दूसरे दिन अखबार में पढ़ा तो पता चला कि सुलतानपुर जेल में बंद कैदियों में मारपीट हो गयी है। हरिहर गांव के संघ कार्यकर्ता सत्यनाम यादव उग्र स्वभाव के थे। उन्हें पुलिस पकड़ ले गयी थी और सुलतानपुर जेल में बंद थे। हमारे साथ गंगा प्रसाद यादव थे। उन्होंने कहा कि सुलतानपुर चलो। अयोध्या से हम और गंगा प्रसाद यादव पैदल सुलतानपुर जेल पहुंचे। वहां गये तो पता चला कि मारपीट सत्यनाम यादव ने ही की थी। जेल में बंद बाबा बाजार के महंत रामप्रीति दास ने सत्यनाम यादव को बचाया था। रामप्रीत दास सत्यनाम का अपने गद्दों के नीचे छुपाया था और उस पर आसन लगाकर बैठ गये थे। उत्तेजित भीड़ सत्यनाम को खोज नहीं पायी थी। गांव से साथ में अयोध्या के लिए निकले जगन्नाथ यादव और तुलसी राम बढ़ई कारसेवा खत्म होने के 10 दिन बाद वापस घर पहुंचे। उन्हें पुलिस ने ट्रक में भरकर जौनपुर के आगे छोड़ दिया था।
उन्होंने बताया कि 1984 में जब अयोध्या में सरयू तट पर संकल्प सभा हुई थी और सरयू के जल में खड़े होकर संकल्प लिया गया था तब भी मैं वहां उपस्थित था। उसके बाद राम जानकी रथ के साथ-साथ पैदल निकले। भेलसर पहुंचने पर राम जानकी रथ यात्रा पर मुस्लिमों ने हथगोला फेंका। इसके बाद संतों ने तय किया कि राम जानकी रथ की सुरक्षा सरकार के भरोसे नहीं रहेगी। भेलसर में ही बजरंग दल का गठन किया गया और विनय कटियार को उसका संयोजक बनाया गया। इसके बाद मवई चैराहे पर बड़ी सभा हुई। सभा को महंत रामचन्द्र दास ने संबोधित किया।
हिन्दुस्थान समाचार/बृजनन्दन/दिलीप
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