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नई दिल्ली, 11 फरवरी (हि.स.)। हिंदी एवं मैथिली की प्रख्यात कथाकार, कवयित्री और लेखिका पद्मश्री डॉ. उषाकिरण खान का रविवार को निधन हो गया। वे 78 साल की थीं। उन्होंने पटना के मेदांता अस्पताल में अपराह्न 03 बजे अंतिम सांस ली। साहित्य अकादमी ने उनके निधन पर गहरा शोक जताया है।
साहित्य अकादमी के सचिव डॉ. के. श्रीनिवासराव ने शोक संदेश में कहा कि प्राचीन और आधुनिक कालखंड के जनजीवन और संस्कृति के उत्थान-पतन की गाथा को ऐतिहासिक दृष्टि से प्रस्तुत करने वाली उषाकिरण खान के व्यक्तित्व पर अपने स्वतंत्रता सेनानी गांधीवादी पिता के संस्कारों का गहरा प्रभाव पड़ा। उन्हें हजारी प्रसाद द्विवेदी और नागार्जुन जैसे साहित्यकारों का स्नेह और सान्निध्य प्राप्त हुआ। उन्होंने संस्कृत, पालि, अंग्रेजी, मैथिली एवं हिंदी के प्राचीन साहित्य का गहन अध्ययन किया था। वह बीडी कॉलेज पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास और पुरातत्त्व विभाग की अध्यक्ष रहीं।
कई विधाओं में बहुआयामी लेखन करने वाली उषाकिरण के हिंदी-मैथिली में 17 से अधिक उपन्यास, सात कहानी संकलन, नौ काव्य-संग्रह, बाल साहित्य की पांच पुस्तकें, कथेतर साहित्य की तीन पुस्तकें और चार मैथिली नाटक भी चर्चित रहे हैं। महिलाओं की समानता की गहरी पक्षधर रहीं उषाकिरण खान का यही सबल स्वत्व बोध उनके रचनात्मक व्यक्तित्व को विशेषता प्रदान करता है। पद्मश्री अलंकरण के अलावा उनको बिहार राष्ट्रभाषा परिषद का हिंदी सेवी पुरस्कार, बिहार राजभाषा का महादेवी वर्मा पुरस्कार, कुसुमांजलि पुरस्कार, भारत भारती पुरस्कार तथा मैथिली भाषा में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उषाकिरण खान का समृद्ध कृतित्व भारतीय साहित्य की पूंजी है।
हिन्दुस्थान समाचार/ पवन कुमार