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जोधपुर, 05 मार्च (हि.स.)। भारतीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संगठन एवं केन्द्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में कृषि पारिस्थितिकी तंत्र में सतत कृषि विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने में चुनौतियां विषय पर चल रही तीन दिवसीय कॉन्फ्रेंस मंगलवार को काजरी में संपन्न हो गई। कांफ्रेंस में देश के विभिन्न राज्यों के के कारीब ढाई सौ वैज्ञानिक शोधकर्ताओं ने भाग लिया।
तीन दिवसीय कॉन्फ्रेंस में सबसे ज्यादा देश में वर्षा आधारित खेती को अलग-अलग माध्यम से बेहतर बनाकर अधिक उत्पादन पर जोर दिया गया। वैज्ञानिकों ने बताया कि देश में कृषि भूमि जनसंख्या के बढऩे के साथ ही कम होती जा रहा है। वहीं अनाज की डिमांड बढ़ती जा रही है। ऐसे में सबसे बड़ा चैलेंज कम जमीन से बेहतर और गुणवत्तायुक्त उत्पादन को लेना है। इसी को लेकर देशभर के अलग-अलग क्षेत्रों में होने वाली पैदावार को लेकर शोध कर रहे वैज्ञानिकों ने इस संबंध में अपने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किए। कार्यशाला में वैज्ञानिकों ने राजस्थान में खेती को लेकर अपने शोध प्रस्तुत किए। इसमें पश्चिम राजस्थान के सूखे और गर्म वातावरण को लेकर जीरा, इसबगोल जैसी महंगी फसलों को लेकर एक्सपर्ट ने अपने-अपने शोध पेश किए और पश्चिम राजस्थान में इन फसलों के पैदावार को लेकर ज्यादा ऑप्शन भी बताए।
इस कार्यशाला में कृषि के काम आ रहे सभी प्रकार के प्राकृतिक संसाधनों को लेकर भी चर्चा की गई। इसमें पानी, खाद, जैविक खाद, पशु-पक्षियों के सहयोग सहित अन्य प्राकृतिक संसाधन शामिल है। वैज्ञानिकों का कहना है कि धीरे-धीरे प्राकृतिक संसाधन लुप्त होते जा रहे है। इसे अभी से सहित तरह से प्रबंधित कर काम में लेना होगा। तभी गुणवत्तापूर्ण कृषि को आगे बढ़ाया जा सकेगा।
कार्यशाला में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् नई दिल्ली के उपमहानिदेशक डॉ. एसके चौधरी, आईसीएआर के सहायक महानिदेशक डॉ. राजबीर सिंह, आईआईटी जोधपुर के निदेशक प्रो. शान्तनु चौधरी, वीएनएमकेवी, परभनी के कुलपति प्रो. आई.एम. मिश्रा, काजरी निदेशक डॉ. ओपी, अजराई के सचिव डॉ. विपिन चौधरी, तेलंगाना के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. वी रविंद्र रेड्डी सहित काफी संख्या में वैज्ञानिक शामिल हुए।
हिन्दुस्थान समाचार/सतीश/संदीप