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-ढांचे को ढहाने की कहानी झांसी के प्रत्यक्षदर्शी कारसेवक की जुबानी
झांसी,16 जनवरी(हि.स.)। सनातन संस्कृति के आदर्श मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम अपने जन्मस्थली अयोध्या में भव्य व दिव्य मंदिर में 22 जनवरी को रामलला के रूप में विराजेंगे,लेकिन 500 वर्षों तक की प्रतीक्षा करने,लाखों लोगों के बलिदान और कई पीढ़ियां गुजर जाने के बाद कारसेवकों को प्रभु श्रीराम के मंदिर के निर्माण और उनकी प्राण प्रतिष्ठा के आयोजन की वार्ता आज भी उन्हें भावुक बना देती है।
मर्यादा पुरुषोत्तम के आदर्शों को अपने जीवन में उतारने वाले उनके भक्त कारसेवक जब 22 जनवरी की चर्चा करते हैं तो उनके सामने कारसेवा का पूरा मंजर घूमने लगता है। कई ऐसे अनसुने संस्मरण और घटनाक्रम हैं जो आज लोगों तक नहीं पहुंच सके हैं। उनमें से एक यह संस्मरण भी है। यह तो सभी जानते हैं की विवादित ढांचा कारसेवकों के द्वारा ढहा दिया गया था, लेकिन यह शायद ही कोई जानता होगा कि यह कार्य अपने सांसारिक दायित्व का निर्वहन करते हुए अपने धार्मिक दायित्व का बोध रखने वाले पीएसी जवान कारसेवकों ने भी किया था। यही नहीं कारसेवकों ने जिन औजारों व सब्बलों का प्रयोग ढांचे को ढहाने में किया था। वी भी उन्हें पीएसी जवानों ने कारसेवकों को उपलब्ध कराई थी। यह बात अब जाकर झांसी के प्रत्यक्षदर्शी कारसेवक 87 वर्षीय चुन्नाबाबू गुप्ता बताते हैं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक स्वयंसेवक होने के नाते आज भी वह पांचजन्य के जिला प्रतिनिधि हैं। उन्होंने बताया कि जिस समय बाबरी मस्जिद का ढांचा ढहाया गया था,उस समय झांसी के भी तीन कारसेवक वहां उपस्थित थे। उनमें से एक वह स्वयं थे। इसके अलावा स्वर्गीय भगवान सहाय दुबे जो की एक रिटायर्ड बाबू थे तथा देवी सिंह चाहर भी वहां पर मौजूद थे।
उन्होंने कहा की ढांचा तो पीएसी के जवानों के तंबुओं में रखी सब्बलों व अन्य औजारों से गिराया गया था। यही नहीं ढांचे को ढहाने के साथ ही सादा वर्दी में पीएसी के जवान कारसेवकों ने खूब नृत्य भी किया था। वाकई उनकी कारसेवा की प्रशंसा होनी चाहिए। इस तरह पीएसी के जवान दो-दो दायित्वों का निर्वहन कर रहे थे।
उन्होंने बताया कि उस स्थान की सुरक्षा व्यवस्था के लिए टेंट लगाकर पीएसी के जवान पहरा देते हुए सांसारिक दायित्व का निर्वहन कर रहे थे। तो दूसरी ओर सनातन संस्कृति के दायित्व का निर्वहन करते हुए उन्होंने सादा वर्दी में अपने ही टेंट में रखे औजारों से ढांचा ढहाने में कारसेवकों की मदद भी की थी। उन्होंने बताया कि जब विवादित ढांचा का सबकुछ समाप्त हो गया तो वहां पर बाकायदा एक टेंट लगाया गया। और फिर बाद में इस टेंट में रामलला विराजमान हुए।
उन्होंने बताया कि कारसेवा तो वह शुरू से ही करते आ रहे हैं। यहां तक कि ताला खोलने के समय भी वह अयोध्या गए थे। उस समय वह 8 बस्तियों के प्रमुख का दायित्व भी निभा रहे थे। 1990 और 1992 की कारसेवा के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि उन्हें जेल नहीं भेजा गया था क्योंकि सामाजिक समरसता का एक उदाहरण देखकर उनके नगर चिरगांव का थानेदार प्यारेलाल अहिरवार उनका बहुत बड़ा प्रशंसक बन गया था। और इसीलिए उन्हें जेल नहीं भेजा गया। उन्होंने बताया कि चिरगांव से कुल 17 लोग जेल गए थे। और उन्होंने उस समय परिवार चलो अभियान के तहत जो कारसेवक जेल गए थे,उनकी चिट्ठियां लाने व ले जाने का काम किया था।
हिन्दुस्थान समाचार/महेश/राजेश