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-संतों ने गांव-गांव जाकर राम मंदिर के लिए जनजागरण किया: स्वामी सिद्धेश्वरानन्द
अयोध्या, 20 जनवरी (हि.स.)। विरक्त सन्यासी स्वामी वामदेव महाराज राम मंदिर आन्दोलन के पुरोधा थे। उन्होंने संत समाज को राम मंदिर आन्दोलन से जोड़ने का काम किया। स्वामी वामदेव कहते कि अभी तक हमने राम जी की उपासना की, अब हम राष्ट्रदेव की उपासना करेंगे। उनके कहने पर साधु संत राष्ट्र को अपना इष्ट मानकर चल पड़े क्योंकि बड़े-बड़े संत व शंकराचार्य उनके शिष्य थे। जानकारी गौरी शंकर आश्रम सालासर आश्रम जयपुर के स्वामी सिद्धेश्वरानन्द ने दी।
स्वामी सिद्धेश्वरानन्द ने बताया कि स्वामी वामदेव की विरक्त की मण्डली में मैं रहा हूं। उन्होंने हिन्दुस्थान समाचार को बताया कि महंत नृत्यगोपालदास स्वामी वामदेव को गुरु भाव से मानते थे। जगदगुरू शंकराचार्य स्वामी निश्चलानन्द सरस्वती स्वामी वामदेव के विद्यार्थी थे। स्वामी वामदेव भारत की इतनी बड़ी विभूति थे कि उनको शब्दों में बता पाना कठिन था। उन्होंने कभी शिष्य नहीं बनाया। कहीं कुटिया नहीं बनाई। लहसुन, प्याज, चुकंदर का कभी सेवन नहीं किया। यह वैष्णव संतों के लिए निषिद्ध है।
जब विश्व हिन्दू परिषद ने राम मंदिर आन्दोलन को अपने हाथ में लिया। तब अशोक सिंहल स्वामी वामदेव के पास पहुंचे और कहा कि महाराज आप ही साधु समाज को इकट्ठा कर सकते हैं। सम्प्रदायों में मतभेद रहता है। शंकराचार्यों में भी मनभेद रहता है। स्वामी वामदेव ने कहा कि यह जिम्मेदारी मेरी है। करपात्री जी महाराज स्वामी वामदेव से मिलने आया करते थे। करपात्री महाराज ने कहा कि मैं सबको इकट्ठा करूंगा। स्वामी वामदेव जिस संत के आश्रम में जाते थे वहां नीचे बैठ जाते थे। महाराज जी कहते थे कि हमें ऊपर बैठाना चाहते हैं तो हमारे साथ बैठ जाइए। कहते कि हम एक अखिल भारतीय संत समिति बना रहे हैं उसमें आप को जुड़ना है। स्वामी मुक्तानंद को अध्यक्ष बनाया गया। हंसदास कबीर पंथी आचार्य थे। बाद में वैष्णव पंथ स्वीकार किया। स्वामी वामदेव त्याग की प्रतिमूर्ति थे। वृन्दावन आनंद कुटी में वह एक लंगोटी में रहा करते थे। वह निरंतर भारतीय वेदांत ग्रन्थ का अध्ययन करते थे। वाराणसी के चोटी के संत चैतन्य भारती महाराज से स्वामी जी ने शिक्षा ग्रहण की थी।
स्वामी वामदेव ने राम मंदिर के लिए संघर्ष किया है और लाठियां खाई। 1990 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने कहा कि अयोध्या में परिन्दा पर नहीं मार सकता। स्वामी वामदेव ने कहा, मुलायम सिंह यह आपका अभिमान बोल रहा है। उन्होंने कहा कि आज मुलायम बहुत कठोर हो गया है। वह अब मुलायम नहीं रहा है। वामदेव ने कहा कि यह यदुवंशी है। इसे संतों के प्रति दयाभाव रखना चाहिए। अब साधु संतों का दुश्मन हो रहा है, इसलिए हम तुम्हें मुल्ला मुलायम कहेंगे। साध्वी ऋतम्बरा ने तो स्वामी वामदेव का वह शब्द पकड़ लिया और मुल्ला मुलायम कहा जाने लगा। मुलायम सिंह ने 1990 में अयोध्या आने पर प्रतिबंध लगा दिया था फिर भी स्वामी वामदेव अयोध्या में प्रवेश कर मणिराम जी की छावनी पहुंच गये। पुलिस उन्हें पकड़ नहीं पायी। तब उन्होंने कहा था, मुलायम सिंह आप ने कहा था कि परिंदा पर नहीं मार सकता। देखो वामदेव आ गया है। स्वामी वामदेव ने कारसेवा के लिए बने बलिदानी जत्थे का भी नेतृत्व किया था।
सिद्धेश्वरानन्द ने कहा कि स्वामी वामदेव का नाम लेने से जिह्वा पवित्र हो जाती है। उनका जीवन अखण्ड ब्रम्हचर्य का था। वह साधु समाज के आदर्श हैं। उनके नेतृत्व में संतों ने गांव-गांव जाकर राम मंदिर के लिए जन जागरण कर पूरे राष्ट्र को जगाया। उनका जीवन संतों के लिए अनुकरणीय है। उनके कारण ही साधु संत इकट्ठा हुए थे। उन संतों के कारण आज राम मंदिर बन रहा है। उनका जीवन हम सभी संतों के लिए अनुकरणीय था। उन्होंने ही हमें साधुता सिखाई। राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के लिए आमंत्रण के साथ जो अतिथियों को एक पुस्तिका भेजी गयी है, उसमें स्वामी वामदेव का उल्लेख किया गया है। तीर्थपुरम क्षेत्र में जो संतों के निवास बनाये गये हैं, उनमें स्वामी वामदेव के नाम से भी एक नगर का नाम रखा गया है।
हिन्दुस्थान समाचार/बृजनन्दन
/आकाश