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– पराधीनता के सारे चिह्न देश से हटने चाहिए : अम्बरीष
(साक्षात्कार)
अयोध्या, 15 जनवरी (हि.स.)। राम की जन्मभूमि पर बन रहा मंदिर एक लम्बे संघर्ष का सुपरिणाम है। इसके लिए लाखों की संख्या में हिन्दुओं ने बलिदान दिया है। पूरा भारत आज खुश है। यह सुअवसर पहली बार देखने को मिल रहा है। क्योंकि यह कोई सामान्य मंदिर नहीं है। सामान्य मंदिर होता तो बाबर इसे तोड़ता नहीं। दुनिया में फैले हुए हिन्दुओं की आस्था का केन्द्र है इसलिए इस मंदिर को तोड़ा गया। यह बातें विश्व हिन्दू परिषद के केन्द्रीय मंत्री अम्बरीश ने हिन्दुस्थान समाचार से साक्षात्कार के दौरान कही।
उन्होंने कहा कि राम मंदिर के लिए हिन्दू समाज ने 76 लड़ाइयां लड़ी। वह जानते थे कि लड़ने से हमजीत नहीं सकते हैं,हम लड़कर मंदिर भी नहीं बना सकते। लेकिन मंदिर के लिए मर तो सकते हैं। एक मरा तो दूसरा डरा नहीं फिर मरने के लिए सीना तैयार करके गया। मरते इसलिए गये कि आने वाली पीढ़ी को पता चले कि यह राम की जन्मभूमि है। प्रस्ततु है विहिप के केन्द्रीय मंत्री अम्बरीश से हिन्दुस्थान समाचार के वरिष्ठ संवाददाता बृजनन्दन राजू की बातचीत।
राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा को आप किस रूप में देख रहे हैं?
राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा राष्ट्रीय स्वाभिमान की पुनः प्रतिष्ठा के महायज्ञ की पूर्णाहुति नहीं श्रीगणेश है। इस यज्ञ की पूर्णाहुति तब होगी जब पराधीनता के सारे चिह्न देश से हट जायेंगे। राम के देश में अफजल खां की समाधि है। बिहार में बख्तियापुर जंक्शन,शाहजहां रोड,तुगलक रोड,कश्मीर में मुगल रोड है। यह कौन लोग थे क्या योगदान है। इन्होंने जजिया लिया, मंदिर तोड़े, गाय काटी इन्होंने माताओं के मान भंग किये।
जिस रामलला के विग्रह की पूजा अनेक वर्षों से हो रही है, उसे गर्भगृह में स्थान क्यों नहीं दिया गया?
यहां विग्रह देव नहीं हैं। यहां जन्मभूमि देव है। क्योंकि विग्रह तो 1528 में हट गया था। मंदिर भी टूट गया था। लेकिन पंचकोसी और 84 कोसी परिक्रमा होती रही। आज जो यह मंदिर बन रहा है अगर हिन्दू समाज बलिदान न दिया होता तो आज की पीढ़ी को जन्मभूमि का पता भी नहीं होता। इसलिए इस आन्दोलन को 1984 से शुरू हुआ, ऐसा मानना ठीक नहीं है। जिस क्षण मंदिर टूटा तब से उसका प्रतिकार हुआ। तब से जितने हमारे पुरखों का बलिदान हुआ उन सबका इसमें योगदान है।
कुछ राजनीतिक दल कह रहे हैं राम के नाम पर राजनीति हो रही है?
यह आरोप निराधार है। 1990 में आडवाणी की यात्रा निकली। आह्वान तो सम्पूर्ण समाज का था, लेकिन भाजपा साथ खड़ी हुई तो उसको लाभ मिला। राम मंदिर आन्दोलन में कई सरकारें आयीं और कई सरकारें गयीं। प्राण प्रतिष्ठा का निमंत्रण सबको दिया गया, लेकिन राम जी जिसको चाहेंगे वही आयेगा।
राम मंदिर आन्दोलन में किन-किन संतों की प्रमुख भूमिका रही है?
पूरा राम मंदिर आन्दोलन पूज्य संतों के मार्गदर्शन में ही चला। गोरक्षपीठाधीश्वर महंत अवैद्यनाथ,पूज्य रामानंदाचार्य शिवरामाचार्य महाराज,पूज्य शंकराचार्य विष्णुदेवानंद महाराज,वीतराग स्वामी नामदेव महाराज, दिगम्बर अखाड़ा के महंत रामचन्द्रदास,राम मंदिर आन्दोलन के सेनापति श्रद्धेय अशोक सिंहल,मोरापंत पिंगले,आचार्य गिरिराज किशोर,राम मंदिर के लिए सत्ता को ठोकर मारने वाले कल्याण सिंह,दाऊदयाल खन्ना,ओंकार भावे,ठाकुर गुरूजन सिंह जैसी विभूतियां को योगदान को भुलाया नहीं जा सकता।
राम मंदिर को लेकर हिन्दू समाज में किस प्रकार का उल्लास है?
आज राम के साथ पूरा समाज खड़ा है। रामलला की जन्मभूमि पर बन रहे मंदिर के शिखर आकाश चूमने वाले हैं। इससे हिन्दुओं को मस्तक ऊंचा हो गया है। 496 वर्ष बाद रामलला अपनी जन्मभूमि में आन—बान—शान से विराजमान होंगे। हम धन्य हैं,यह सुयोग हमारे जीवनकाल में आया।आन्दोलन के दौरान हम लोग नारा लगाते थे जो स्वप्न देखते बाबर का अरमान मिटाकर मानेंगे। आज बाबर का स्वप्न देखने वालों के अरमान को हमने भूमिसात कर दिया है।
हिन्दुस्थान समाचार/बृजनन्दन
/राजेश
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