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-पूरे भारतवर्ष में उत्सव का माहौल, हर वर्ग रामानुराग में डूबा
प्रयागराज, 20 जनवरी (हि.स.)। पूरे भारत वर्ष में उत्सव का माहौल है। समाज का हर वर्ग रामानुराग में डूबा हुआ है। भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म प्रभु श्रीराम के बिना अधूरे हैं। राम मंदिर निर्माण से पूरा देश अयोध्या में समाहित हुआ जा रहा है। ज्यों-ज्यों प्राण प्रतिष्ठा की घड़ी नजदीक आती जा रही है, देश उतना ही राममय होता जा रहा है। हर आदमी अपने-अपने स्तर से इस राष्ट्रीय उत्सव से किसी न किसी प्रकार से जुड़ने के लिए आतुर है।
यही है राम के चरित्र की विराटता जो युगों से चली आ रही है। जिसके बारे में सुना तो सभी ने है, पर प्रत्यक्ष अनुभव पहली बार हो रहा है। राम जन्मभूमि मंदिर निर्माण के साथ ही, राम मंदिर आंदोलन के इतिहास एवं उससे जुड़े लोगों के योगदान को जानने की जिज्ञासा भी स्वाभाविक रूप से आम जनमानस के मन में प्रबल है। प्रभु श्री राम के जीवन चरित्र और राम मंदिर आंदोलन में एक समानता परिलक्षित होती है, वो है अन्याय के विरुद्ध धैर्य पूर्वक, बिना विचलित हुए सत्य के लिए संघर्ष करना। आज का यह आनंद सदियों के धैर्य और संघर्ष का ही प्रतिफल है जिसमें अनेकों मनीषियों, संतों और आम जनमानस का योगदान है। ऐसे ही एक मनीषी हैं धीरेन्द्र सिंह जफा जिन्होंने राम मंदिर आंदोलन में एक अभूतपूर्व योगदान दिया है, जो राम मंदिर निर्माण आंदोलन को नई ऊर्जा और दिशा देने वाली साबित हुई।
धीरेन्द्र सिंह जफा के मित्र राजेश तिवारी कहते हैं कि रामलला के प्राकट्य के अगले वर्ष 1950 से पौष शुक्ल तृतीया को हर वर्ष राम प्रकट्य उत्सव औपचारिक रूप से विवादित स्थल के बाहर किया जाता था। परंतु 4 जनवरी 1984 में 34वीं वर्षगांठ पर, राम प्राकट्य उत्सव विशेष उत्साह के साथ मनाया गया। इस अवसर पर भव्य शोभा यात्रा निकाली गयी। आंदोलन के इतिहास में पहली बार विवादित ढांचे के बुर्ज पर हनुमान पताका फहराई गई और गर्भगृह में पहली बार हवन किया गया। ये दोनों बातें अभूतपूर्व एवं अति महत्पूर्ण थीं। यह खबर जंगल में आग की तरह फैल गई और इसका असर दिल्ली तक हुआ। यह कार्यक्रम पूरे राम मंदिर आंदोलन के लिये उर्वरक सिद्ध हुआ और राम मंदिर निर्माण की चर्चा राष्ट्रीय स्तर पर जीवंत हो उठी, जिसके दूरगामी परिणाम हुए। इस सफल कार्यक्रम के संयोजक और सूत्रधार थे, विंग कमांडर धीरेन्द्र सिंह जफा।
उन्होंने कहा कि अद्भुत व्यक्तित्व के धनी धीरेन्द्र सिंह जफा का जीवन रोमांच और साहस का संगम है। वर्ष 1954 में भारतीय वायु सेना में फाइटर पायलट के रूप में भर्ती हुए। जनवरी 1971 में इनका चयन भारतीय वायु सेना प्रमुख के परिसहायक अफसर (एडीसी) के पद पर हुआ। परन्तु जब पाकिस्तान के साथ युद्ध अवश्यम्भावी हो चला, तब उन्होंने मातृभूमि की रक्षा के लिए प्रतिष्ठित पद एवं परिवार को पीछे छोड़कर युद्ध के अग्रिम पंक्ति में खड़ा होना चुना। पाकिस्तान पर कई सफल जबरदस्त हमलों के बाद उनका विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया और वह एक वर्ष तक पाकिस्तान में युद्धबंदी रहे। स्वदेश वापसी पर युद्ध में नेतृत्व कौशल एवं वीरता के लिए इन्हें वीर चक्र से सम्मानित किया गया था।
अयोध्या के वनवास से राज्याभिषेक तक की इस यात्रा में जिन ज्ञात-अज्ञात लोगों ने सदप्रयास किया, उनका यथोचित सम्मान अयोध्या का सम्मान होगा। आज अयोध्या का आधुनिक निर्माण हो रहा है जो अत्यंत प्रसन्नता का विषय है, पर इस नव निर्माण में नीव के ईंट खो न जाएं, इसके लिए भी कुछ सोचना होगा। ताकि भविष्य के साथ हमारा इतिहास भी सुरक्षित और प्रत्यक्ष रहे। जिससे हमारी युवा पीढ़ी इन महानुभावों से प्रेरणा प्राप्त कर राष्ट्र और धर्म की रक्षा के लिए आगे आए।
हिन्दुस्थान समाचार/विद्या कान्त/दिलीप