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-वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय ने लालकृष्ण आडवाणी को भारत रत्न दिए जाने पर ‘हिन्दुस्थान समाचार’ के प्रतिनिधि डॉ मयंक चतुर्वेदी से बातचीत में जो कहा, यहां प्रस्तुत है उसके मुख्य अंश-
नई दिल्ली, 03 फरवरी (हि.स.)। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) के अध्यक्ष और हिन्दुस्थान समाचार के समूह संपादक, वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय का कहना है कि लालकृष्ण आडवाणी इस सदी के कितने बड़े राजनेता हैं, वह उनके तत्कालीन समय में लिए गए अनेक निर्णयों से पता चलता है। उनके साथ बिताए कई दिन और घण्टों में से कुछ का जिक्र करते हुए रामबहादुर राय ने कहा, ”1995 में भाजपा के मुंबई अधिवेशन में अध्यक्ष रहते हुए आखिरी दिन उन्होंने भरी सभा में समापन के पूर्व घोषणा कर दी थी कि केंद्र में जब भी भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनेगी तो हमारे दल की ओर से अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री होंगे। निश्चित ही यह भारतीय राजनीति की अनोखी घटना है।”
वे आगे बताते हैं, ”अनोखी इसलिए है, क्योंकि रामरथ यात्रा के बाद लालकृष्ण आडवाणी जी भाजपा के नंबर एक नेता हो गए थे। उस यात्रा के परिणामस्वरूप 1991 में भाजपा 120 सीटें लोकसभा की जीतने में सफल रही। इससे पहले आम धारणा थी कि जनसंघ या भाजपा गठबंधन की राजनीति में ही सबसे अधिक फायदे में रहती है। राम मंदिर आंदोलन के दौरान भी 1989 में गठबंधन कर भाजपा लोकसभा की 86 सीटें जीत पाई थी, जबकि रथयात्रा के बाद अकेले अपने बूते चुनाव लड़ने पर भाजपा की सीटें बढ़कर 120 हो गईं। भाजपा ने उत्तर प्रदेश में अपने बूते पर सरकार बनाई। इसके बाद से ही सत्तारूढ़ पार्टी के विकल्प के रूप में एक वैकल्पिक भूमिका भाजपा की देखने को मिली।”
बिना किसी से पूछे प्रधानमंत्री के रूप में वाजपेयी के नाम की कर दी थी घोषणा
इ.गां.रा.क.के अध्यक्ष राय कहते हैं कि ”एक ऐसी पार्टी का नेता जो सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी हो तथा 1991 में आडवाणी जी लोकसभा में भाजपा संसदीय दल के नेता थे। तब वह राजनेता बंबई के अधिवेशन में स्वयं को प्रधानमंत्री का दावेदार घोषित न करते हुए कहे कि यदि सत्ता में आते हैं तो हमारी ओर से वाजपेयी जी प्रधानमंत्री होंगे, यह कहना अपने आप में बहुत बड़ा त्यागपूर्ण निर्णय था। जबकि उन्होंने इस बारे में न अपने दल में कोई चर्चा की थी, न संघ को इस बारे में कोई खबर थी। वे प्रधानमंत्री की दौड़ में सबसे आगे थे। इसके साथ ही संगठन पदाधिकारी-कार्यकर्ता तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में भी उन्हीं की स्वीकार्यता सबसे अधिक थी, इसके बाद भी अटल बिहारी वाजपेयी को आगे रखना और स्वयं को पीछे रखकर चलना अपने आप में एक बड़ा निर्णय माना जा सकता है।”
राय बताते हैं कि उनके इस निर्णय की भारी प्रतिक्रिया हुई। भाजपा में गोविन्दाचार्य, प्रमोद महाजन जो उस समय पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव थे तथा कई अन्य दिग्गज राजनेता, उनके करीबी, रा.स्व. संघ के पदाधिकारीगण ही नहीं हम जैसे कुछ पत्रकार, जोकि उनसे नियमित तौर पर मिलते थे, यह जानना चाहते थे कि आखिर बिना किसी से सलाह लिए उन्होंने इतना बड़ा निर्णय अकेले ले कैसे लिया? हम पत्रकार साथी, गुरुमूर्ति, दीनानाथ मिश्रा, बलवीर पुंज, स्वपनदास गुप्ता, चंदन मित्रा एक साथ अरुण जेटली को लेकर उनसे समय लेकर मिलने गए। उस समय राजेंद्र शर्मा संसदीय सचिव थे, उन्होंने लोकसभा में आडवाणी जी के आते ही सूचना दी और हम सभी उनके कक्ष में मिलने पहुंचे। यहां पहला प्रश्न आडवाणी से यही किया गया कि आपको बताना होगा कि आखिर आपने यह घोषणा क्यों की? तब वे बोले थे- भाजपा कार्यकर्ताओं, संघ के स्वयंसेवकों और आप जैसे सभी शुभचिंतकों में मेरी लोकप्रियता ज्यादा होगी, मेरे प्रति आप सभी का श्रद्धा भाव भी अधिक होगा, मैं समझता हूं, किंतु जनता के बीच अटल बिहारी वाजपेयी ही स्वीकृत हैं, मैं नहीं। मैं जानता हूं, समाज में, जनता जनार्दन के बीच वाजपेयी जी की स्वीकार्यता ज्यादा है, इसलिए बिना किसी से पूछे अपनी ओर से यह निर्णय कर लिया। वस्तुत: राजनीति में ये जो मानक आडवाणी जी ने उपस्थित किया, ऐसा कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिलता है।
विभाजित पाकिस्तान में स्वयंसेवकों को मदद पहुंचाने जा चुके हैं आडवाणी
वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय ने एक और प्रसंग बताया- यह बात 2010 की है। जब मैं और पूर्व राज्यसभा सांसद आरके सिन्हा दिल्ली में प्रवासी भवन पहुंचे। वहां न्यूज एजेंसी ‘हिन्दुस्थान समाचार’ के महाप्रबंधक रहे स्व. बालेश्वर अग्रवाल के जन्मदिवस के उपलक्ष्य में अभिनन्दन समारोह चल रहा था, उसमें लालकृष्ण आडवानी जी आए हुए थे। वहां आडवाणी जी ने अपने भाषण में बताया कि मैं ‘हिन्दुस्थान समाचार’ का प्रतिनिधि होकर कराची गया था। वास्तविकता में पाकिस्तान में विभाजन के बाद रह रहे स्वयंसेवक परिवारों पर भारी विपदा आई हुई थी। उस समय श्रीगुरुजी ने उन्हें पाकिस्तान जाकर उनके हाल जानने और उन्हें आवश्यक मदद पहुंचाने के लिए कहा, लेकिन संघ से घोर नफरत करने वाले पाकिस्तान में जाए कौन? यह एक बड़ा प्रश्न सभी के सामने खड़ा हुआ था। तब तय हुआ कि लालकृष्ण आडवाणी को वहां भेजा जाना चाहिए। वह जाकर सभी के सही हालचाल जानेंगे और जो आगे मदद हो सकेगी वह करने का प्रयास किया जाएगा। तब भारत सरकार के अधिमान्य पीआईबी मान्यता कार्ड होल्डर पत्रकार ‘हिन्दुस्थान समाचार’ के नाते आडवाणी पाकिस्तान गए और वहां जाकर जो-जो काम उन्हें सौंपे गए थे, वे सभी उन्होंने किए।
आडवाणी का सामाजिक जीवन पत्रकार के नाते हुआ शुरू
रामबहादुर राय बताते हैं कि लालकृष्ण आडवाणी के जीवन की यात्रा संघ के स्वयंसेवक के रूप में शुरू होती है, किंतु उनका पहला सामाजिक जीवन भारत सरकार के मान्यता प्राप्त भाषायी पत्रकार के रूप में ‘हिन्दुस्थान समाचार’ के माध्यम से शुरू हुआ है। आडवाणी को दिल्ली के लोग तो जानते थे, लेकिन उनकी सबसे पहले राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तब शुरू हुई जब वे बलराज मधोक और अटल बिहारी वाजपेयी के बाद भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। यहीं से उनकी अखिल भारतीय पहचान बनी। मेरा उनसे पहला संपर्क बिहार आन्दोलन के समय हुआ, तब मेरा मीसा संबंधी केस उच्चतम न्यायालय तक पहुंचा था। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में ‘हिन्दुस्थान समाचार’ में रहते हुए पत्रकारिता की ट्रेनिंग के दौरान मेरा जब उनसे मिलना हुआ तो उन्होंने मेरा परिचय अपने साथ आए मधु दण्डवते से कराया और कहा कि हम लोगों ने इन्हें चुनाव लड़ाने के लिए सोचा था, लेकिन इन्होंने अपने लिए पत्रकारिता चुनी है। मेरा उनके साथ कुछ यात्राओं में भी साथ रहना हुआ।
आडवाणी के जीवन भर की पूंजी पर ये दो भूल भारी पड़ी
वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय उनकी कमियों को भी बताना नहीं भूलते। वे कहते हैं कि आडवाणी जी दो जगहों पर भारी भूल कर बैठे। एक तो यह कि उनके लोगों ने लॉबिंग शुरू कर दी और उन्हें यह समझाने में सफल रहे कि वे प्रधानमंत्री बन जाएं, जोकि आगे उनके कार्यों में देखने को भी मिला। दूसरी भूल पाकिस्तान यात्रा के दौरान उनका मोहम्मद अली जिन्ना की मजार पर जाना और फिर उससे जुड़ा वक्तव्य देना रहा, इसके कारण से अयोध्या, राममंदिर आन्दोलन को बहुत नुकसान हुआ। राष्ट्रवादी नेता के तौर पर पहचान रखने वाले आडवाणी को पाकिस्तान में जिन्ना की तारीफ करना उनकी छवि के उलट माना जा सकता है।
हिन्दुस्थान समाचार/मयंक/जितेन्द्र/आकाश