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– संयुक्त बयान जारी कर इसे नागरिकों के बीच भेदभाव करने वाला बताया
– लोकसभा चुनाव से पहले अधिनियम के लागू करने की टाइमिंग पर भी सवाल उठाया
नई दिल्ली, 12 मार्च (हि.स.)। देश के बड़े मुस्लिम संगठनों और बुद्धिजीवी ने नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) को लोक सभा चुनाव से पूर्व लागू किए जाने का विरोध किया है। संयुक्त बयान में उन्होंने कहा है कि हम समानता और न्याय के बुनियादी सिद्धांतों को कमजोर करने वाले भेदभावपूर्ण कानून के खिलाफ अपना विरोध दर्ज कराने के लिए एकीकृत रुख व्यक्त करने के लिए एकजुट होकर यह प्रेस वक्तव्य जारी कर रहे हैं।
संयुक्त बयान पर हस्ताक्षर करने वाले संगठनों के जिम्मेदारों व बुद्धिजीवियों में मौलाना महमूद असद मदनी अध्यक्ष जमीअत उलमा-ए-हिंद, सैयद सआदतुल्लाह हुसैनी अमीर जमाअत-ए-इस्लामी हिंद, मौलाना असगर इमाम मेहदी सलफी अमीर जमीअत अहल-ए-हदीस हिंद, मौलाना फैसल वली रहमानी अमीर इमारत-ए-शरीआ, मौलाना अनीसुर्रहमान कासमी उपाध्यक्ष ऑल इंडिया मिल्ली काउंसिल, मौलाना यासीन उस्मानी बदायूँनी उपाध्यक्ष ऑल इंडिया मिल्ली काउंसिल, मलिक मोतसिम खान उपाध्यक्ष जमाअत-ए-इस्लामी हिंद, मोहम्मद सलीम इंजीनियर उपाध्यक्ष जमाअत-ए-इस्लामी हिंद, मौलाना हकीमुद्दीन कासमी महासचिव जमीअत उलमा-ए-हिंद, डॉ. सैयद कासिम रसूल इलियास प्रवक्ता ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, मौलाना नियाज फारूकी, शेख मुजतबा फारूक, डॉ. जफरुल-इस्लाम खान पूर्व अध्यक्ष, दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग शामिल हैं।
मुस्लिम संगठनों के इस संयुक्त बयान में कहा गया है कि हम आम चुनाव की घोषणा से ठीक पहले नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) 2019 को लागू करने की कड़ी निंदा करते हैं। यह अधिनियम ऐसे प्रावधानों का परिचय देता है, जो भारतीय संविधान में निहित समानता और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों को नुकसान पहुंचाता हैं। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता के सामान्य सिद्धांतों का प्रतीक है और धर्म के आधार पर व्यक्तियों के बीच अनुचित भेदभाव को रोकता है। नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 2 में खंड (बी) ‘अफगानिस्तान, बांग्लादेश या पाकिस्तान से हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी या ईसाई समुदायों से संबंधित व्यक्ति, जिन्होंने 31 दिसंबर 2014 से पहले भारतीय क्षेत्र में प्रवेश किया’ उल्लेख करके पक्षपातपूर्ण व्यवहार स्थापित करता है। इस अधिनियम में धर्म के आधार पर मुसलमानों को शामिल करने से बचा गया है। इसने नागरिकों के बीच समान अधिकारों के सिद्धांत को गंभीर झटका दिया है। इस प्रकार कानून के तहत समान व्यवहार के सिद्धांत को कमजोर किया जा रहा है। यह भेदभावपूर्ण कानून देश के सामाजिक ताने-बाने को खतरे में डालता है। इससे समावेशिता और विविधता के मूलभूत सिद्धांत नष्ट हो जाते हैं।
बयान में कहा गया है कि भारतीय संसद द्वारा नागरिक संशोधन विधेयक की मंजूरी उपरांत देश भर के मुसलमानों और समाज के अन्य वर्गों ने भारत के संविधान की रक्षा के लिए तत्काल जिम्मेदारी महसूस करते हुए विरोध प्रदर्शन किया। उनका कहना है कि अधिनियम के कार्यान्वयन के लिए चुना गया समय भी प्रश्न खड़ा करता है और संकीर्ण सोच वाले राजनीतिक हितों के लिए समाज में धार्मिक विभाजन पैदा करने के स्पष्ट राजनीतिक मकसद को दर्शाता है। हमारा मानना है कि नागरिकता धर्म, जाति या पंथ के भेदभाव बिना समानता के सिद्धांतों के आधार पर दी जानी चाहिए। अधिनियम के प्रावधान सीधे तौर पर इन सिद्धांतों का उल्लंघन करते हैं और हमारे राष्ट्र के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को खतरे में डालते हैं।
हम सरकार से नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 को निरस्त करने और भारतीय संविधान में निहित समावेशिता और समानता के मूल्यों को बनाए रखने का आग्रह करते हैं।
हिन्दुस्थान समाचार/ एम ओवैस/दधिबल