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नई दिल्ली, 24 फरवरी (हि.स.)। दिल्ली में 2020 के दंगों की चौथी बरसी पर, जीआईए (ग्रुपस ऑफ इंटेलेक्चुअलस एंड एकेडमिशियन) ने नालंदा हॉल, अम्बेडकर अंतरराष्ट्रीय केंद्र में दिल्ली दंगा 2020 के लिए न्याय: निवारण, पुनर्वास और मुआवजा देने पर एक सम्मेलन का आयोजन किया।
प्रारंभ में 2019 के नागरिकता संशोधन विधेयक के विरुद्ध और उत्तर पूर्व दिल्ली में हिंसा के दौरान पृष्ठभूमि, कथन और घटनाओं पर चर्चा की गई।
इस दौरान इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति एस.एन. श्रीवास्तव ने बताया कि हिंसा कैसे हुई और क्यों हुई। उन्होंने समाधान देते हुए कहा कि सरकार सेना के रिटायर्ड कर्मियों की मदद और समर्थन से हिंदू समुदाय पर होने वाली हिंसा को रोक सकती है।
पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति एस.एन. ढींगरा ने सरकारी जवाबदेही और नागरिक समुदाय के सामूहिक प्रयासों के महत्व पर जोर देते हैं। यथा प्रजा, तथा राजा उद्धरण को उद्धृत करके उन्होंने बताया कि लोगों को कैसे कानून और व्यवस्था के अंतर्गत पुलिस के साथ सहयोग करना चाहिए और उन्होंने नागरिकों से स्वरक्षा की सीख लेने और अपनी शिकायतों को उनके साथ साझा करने के लिए आग्रह किया।
कार्यक्रम में किरोड़ीमल महाविद्यालय के अध्यक्ष चंद्र वाधवा ने बताया कि वर्ष 2019 भारतीय राजनीति के इतिहास में एक परिवर्तन का क्षण रहा। इस समय के धारा 370 का उन्मूलन, तीन तलाक का प्रतिषेध और राम जन्म भूमि पर फैसला आया। लेकिन इसने सांप्रदायिक टकराव का रूप लिया जो वास्तव में योजनाबद्ध था।
उन्होंने तथ्यों और रिपोर्ट के अनुसार बताया कि दंगा प्रभावित इन क्षेत्रों में किसी भी मुस्लिम समुदाय पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।
इस सम्मेलन में दिल्ली पुलिस के पूर्व विशेष आयुक्त दीपक मिश्रा, दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश एस.एन. ढींगरा और दिल्ली के पूर्व हुई आयुक्त बीएस बस्सी शामिल रहे। 2020 दिल्ली दंगों के लगभग 50 पीड़ितो द्वारा भी इस बातचीत में भाग लिया गया।
जीआईए की संयोजक वरिष्ठ एव अधिवक्ता मोनिका अरोड़ा ने न्यू जेनरेशन वॉर : सूचना युद्ध पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि कैसे रेडिकल और धर्मान्तरित शक्तियां समुदाय की शांतिपूर्ण वातावरण को सांप्रदायिक दंगों में बदल देती हैं। उन्होंने किसानों के प्रदर्शन, दक्षिण के कटन और चुनावों से पहले हुए दंगों का मुद्दा भी उठाया।
हिन्दुस्थान समाचार/अनूप/प्रभात