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– सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के साथ शिल्प-देशज व्यंजन मेला, नृत्य, गायन- वादन प्रस्तुतियां
भोपाल, 8 मार्च (हि.स.)। मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय में संस्कृति विभाग की ओर महिलाओं की सृजनात्मकता का उत्सव इंद्राणी समारोह आयोजित किया जा रहा है। 08 से 10 मार्च, 2024 तक आयोजित समारोह में मध्यप्रदेश, गुजरात, हरियाणा, आसाम, राजस्थान, नई-दिल्ली, तेलंगाना और महाराष्ट्र राज्यों के महिला प्रधान नृत्य-गायन, वादन के साथ ही देशज व्यंजन, शिल्प मेला एवं चित्रांकन शिविर गतिविधियां संयोजित की जा रही है।
शुक्रवार को समारोह का शुभारंभ संस्कृति संचालक एनपी नामदेव एवं सुधा रघुरामन नई दिल्ली द्वारा दीप प्रज्ज्वलन से किया गया। शुभारंभ अवसर पर सुधा रघुरामन, नई दिल्ली द्वारा भोपाल की भरतनाट्यम नृत्यांगनाओं डॉ. मंजुमणि हतवलने, श्वेता देवेंद्र, कविता साजी नायर एवं नीरजा सक्सेना की शिष्याओं के साथ कर्नाटक संगीत में शिवशक्ति की प्रस्तुति विशेष परिकल्पित की गई।
समारोह की शुरुआत कर्नाटक संगीत से की गई जिसमें सुधा रघुरामन ने शिव तांडव स्त्रोत्रम, ओमकारा तारिणी…, शिव स्तुति और निर्वाणशटकम् की प्रस्तुति दी। इसके बाद नृत्य प्रस्तुति में शिव पंचाक्षर स्त्रोत्र नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय, भस्माङ्गरागाय महेश्वराय, भो शभू और तिल्लाना, अयिगिरि नन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुते…, से प्रस्तुति का समापन किया। इसके बाद डॉ. तृप्ति नागर एवं साथी, उज्जैन द्वारा मटकी नृत्य की प्रस्तुति दी गई। मालवा में मटकी नाच का अपना अलग परम्परागत स्वरूप है। विभिन्न अवसरों पर मालवा के गाँव की महिलाएँ मटकी नाच करती है। ढोल या ढोलक को एक खास लय जो मटकी के नाम से जानी जाती है, उसकी थाप पर महिलाएँ नृत्य करती है। प्रारम्भ में एक ही महिला नाचती है, इसे झेला कहते हैं। महिलाएँ अपनी परम्परागत मालवी वेशभूषा में चेहरे पर घूँघट डाले नृत्य करती हैं। नाचने वाली पहले गीत की कड़ी उठाती है, फिर आसपास की महिलाएँ समूह में कड़ी को दोहराती है। नृत्य में हाथ और पैरों में संचालन दर्शनीय होता है। नृत्य के केद्र में ढोल होता है। ढोल पर मटकी नृत्य की मुख्य ताल है। ढोल किमची और डण्डे से बजाया जाता जाता है।
अगले क्रम में जमुना अखंड़े एवं साथी, हरदा द्वारा कोरकू जनजातीय चिटकोला नृत्य चिटकोरा की प्रस्तुति दी गई। नई फसल की बोबाई एवं उसकी कटाई के बाद खुशी को व्यक्त करने गांव की महिलाएं एकत्रित होकर यह नृत्य़ करती हैं। चिटकोरा, ढोलक, बांसुरी और गीतों के माध्यम नृत्य किया जाता है। एक तरह से गांव की महिलाएं नई फसल के आने पर उत्सव के रूप में एकत्रित होकर नृत्य और गीत के माध्यम से उत्सव मनाती हैं।
सुलेखा कुमारी एवं साथी, झारखंड द्वारा डोमकच्छ नृत्य की प्रस्तुति दी। झारखंड में प्रमुख समारोहों और विवाह के समय यह नृत्य प्रचलित है, जिसमें महिला और पुरुष दोनों ही हिस्सेदारी करते हैं। एक-दूसरे का हाथ पकड़कर इस विशेष नृत्य को करने के लिए एक अर्ध-वृत्त बनाते हैं और गाने के बोल व्यंग्यपूर्ण और आनंद से भरे होते हैं। नृत्य का चलन ज्यादातर अगहन से आषाढ़ महीने तक होता है। यह एक सामूहिक रूप में किया जाने वाला नृत्य है, जिसमें युवक एवं युवतियाँ दोनों भाग लेते हैं। ये नृत्यकार रात भर नृत्य करते हैं।
अगले क्रम में गायत्री कोनवार एवं साथी, आसाम द्वारा बीहू नृत्य पेश किया। असम का जिक्र हो और बीहू नृत्य का जिक्र न आये, तो बात अधूरी सी रह जाती है। असम का यह सबसे प्रचलित लोक नृत्य है। हर्ष और उल्लास का प्रतीक यह नृत्य पूरी तरह से पारंपरिक वेशभूषा में किया जाता है, जिसमें स्त्री और पुरुष समान रूप से हिस्सा लेते हैं। लोक संगीत की थाप पर नृतकों के कदम ताल से ताल मिलाते हुए थिरकते हैं बसंत के आगमन की खुशी में बीहू नृत्य महिलाओं और पुरुषों द्वारा किया जाता है।
मीनल सेवक एवं साथी, गुजरात द्वारा टीपणी नृत्य की प्रस्तुति दी। यह नृत्य विशेष रूप से महिलाओं द्वारा किया जाता है। महिलाएं लोक गीतों के साथ दो अलग-अलग पंक्तियों में फर्श को पीटते हुए टीपनी नृत्य करती हैं। तुरी और थाली, झाँझ, मंजीरा, तबला, ढोल और शहनाई का प्रयोग कर नृत्य किया जाता है। टीपनी नृत्य मुख्य रूप से विवाह, त्योहारों और अन्य विशेष कार्यक्रमों के किया जाता है। समारोह के अवसर पर आयोजित चित्र शिविर में जनजातीय, लोक और समकालीन चित्र परंपरा के 10 महिला चित्रकार चित्रांकन एवं 10 महिला शिल्पी शिल्पों का प्रदर्शन एवं विक्रय किया। इस अवसर पर संग्रहालय परिसर में देशज व्यंजन का स्वाद भी लिया गया।
हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश