[ad_1]

मंडी, 16 जनवरी (हि.स.)। शरद ऋतु में इस वर्ष बारिश न होने से सर्दियों का सूखा ही निकल जाना किसानों व बागवानों के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा है। हालांकि, मंडी जनपद के बड़ादेव कमरूनाग के गूर द्वारा बारिश के लिए परता डाला गया। मगर सारे प्रयास बेकार चले गए यहां तक की नौबत गूर को बदलने की भी आ गई। जबकि रियासतकाल में ऐसी घटना घटी थी, जब देवता के गूर के कहने पर निर्धारित समय पर बारिश हो गई थी। हिमाचल में सेब के बगीचों के अधिकतर कार्य सर्दियों में किए जाते हैं । लेकिन जमीन में नमी न होने के कारण बागवान न तो तौलिए बना पा रहें हैं और न ही कोई खाद डाल पा रहे हैं। चूंकि प्रदेश में अधिकतर बागवानी बर्षा के जल पर निर्भर है और सूखे की इस स्थिति में बागवान स्वयं को असहाय महसूस कर रहा है । यदि जल्द ही बारिश न हुई तो गर्मियों में पानी की कमी देखने को मिल सकती है जिससे सेब की फसल पर प्रतिकूल प्रभाव देखने को मिल सकता है। जिन बागवानो ने नया बगीचा तैयार करना है,अत्याधिक सूखी ज़मीन होने के कारण नए पौधों के लिए गढ़े करना एक चुनौती बन गया है । जिन बागवानो ने गढ़े कर लिए है उनकी चिताएं भी बरकार है ।
अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बर्फवारी न होने के कारण वर्ष भर जल की आपूर्ति करने वाले ग्लेशियर सिकुड़ कर रह गए हैं। सेब के साथ साथ मटर और गेहूँ की फसल न होने से किसानों की कमर ही टूट गयीं है। हिमाचल में बागवान और कृषक चिंतित हैं। हिमाचल प्रदेश में भी सूखे की स्थिति में समुदाय द्वारा सामूहिक रूप से देव से बारिश के लिए अनुष्ठान की परंपरा है। शांगरी रियासत के क्षेत्राधिपति थान देवता के मंदिर में वृष्टि के लिये ब्रह्मभोज की परंपरा रही है। इस अनुष्ठान में पूरे विधान के साथ रियासत के लोग मंदिर में जाकर रात्रि प्रवास कर थानेश्वर देव को प्रसन्न कर वृष्टि का आशीष प्राप्त करते हैं। देव भी लोगों के अनुनय से प्रसन्न होकर वृष्टि करते आए हैं। मंडी रियासत के देव महासु बारिश देने वाले देवता माने जाते हैं।
मंडी जिला की पांगणा उप-तहसील के अंतर्गत महासु देव की नोगी कोठी में लोग एकत्रित होकर देव महासु से बारिश की याचना करते हैं और देवानुग्रह से अवश्यमेव बारिश होती है। कहते हैं कि सूखे में देव महासु ने सत्रहवीं शताब्दी में मंडी के तत्कालीन राजा श्यामसेन ने सूखे की स्थिति में मंडी के सभी देवों के गूरों को बुलाकर बारिश करने का देवानुग्रह करने का आह्वान किया। जब देवता महासु के गूर मंडी के राजा के समक्ष प्रस्तुत हुए तो उन्होंने यह संकल्प लिया कि वे वर्षा के जल से ही भेजनोपरांत हाथ धोएंगे। राजा ने देव महासु के इस अजीब संकल्प का उपहास उड़ाया। चूंकि जून के महीने में मंडी रियासत में सूखे के कारण हाहाकार मचा हुआ था। महीनों से वृष्टि न होने से फसलें बर्बाद हो गई थी और पीने के पानी का घोर संकट खड़ा हो गया था। देव महासु के संकल्प के बाद जब सभी गूर भोजन ग्रहण करने लगे थे तो अचानक महीनों बाद आकाश में बादल आए और देखते ही देखते इतनी भारी बारिश हुई कि मंडी कस्बा डूबने लगा। देव महासु के गूर ने छत्त से गिर रहे जल से अपने जूठे हाथ धोए. राजा श्यामसेन देव महासु के इस अकल्पनीय चमत्कार से अभिभूत हुआ और अपनी पहनी हुई राजसी अचकन गूर को भेंट की। साथ ही दोवता के गूर की देवास्था से अभिभूत होकर बिठरी में कृषि योग्य सिंचित भूमि दान में प्रदान की।
संस्कृति मर्मज्ञ डॉक्टर जगदीश शर्मा का कहना है कि आज सूखे की स्थिति के लिए जहां पर्यावरणीय असंतुलन उत्तरदायी है। वहीं देवास्था के प्रति टूटती श्रद्धा,धर्म परिवर्तन से सनातन धर्म को हो रही हानि व देव संस्कृति,देव पर परा व देव नियमों से विमुख होना भी अनावृष्टि का कारक रही है।
हिन्दुस्थान समाचार/ मुरारी/सुनील